
छत्तीसगढ़, द मीडिया पॉइंट। छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने करीब 24 साल पुराने फर्जी वेतन आहरण और भ्रष्टाचार से जुड़े मामले में बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि केवल शक के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती, ठोस सबूत जरूरी होते हैं। यह मामला जगदलपुर के स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा है जहां साल 1979 से 1985 के बीच कथित तौर पर फर्जी वेतन बिल बनाकर करीब 42 हजार रुपये की सरकारी राशि निकालने का आरोप था।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, तत्कालीन मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. आर.के. सेन और उनके अधीनस्थ कर्मचारियों पर आरोप था कि उन्होंने मिलकर तीन सफाई कर्मचारियों—जयसिंह, लालमणि और मयाराम—के नाम पर फर्जी वेतन बिल तैयार किए। दावा किया गया कि ये कर्मचारी वास्तव में काम नहीं कर रहे थे, लेकिन उनके नाम पर वेतन निकालकर राशि का दुरुपयोग किया गया। साथ ही दस्तावेजों में फर्जी हस्ताक्षर और अंगूठे के निशान लगाने का भी आरोप था।
इस मामले में जगदलपुर की विशेष अदालत ने 28 जनवरी 2002 को आरोपियों को दोषी मानते हुए आईपीसी की विभिन्न धाराओं—420, 467, 468, 471 और 120-बी—सहित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत 2-2 साल की सजा और जुर्माना लगाया था।हालांकि, हाई कोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका। न तो यह साबित हो पाया कि आरोपियों ने फर्जी दस्तावेज तैयार किए और न ही यह कि उनका इस्तेमाल किया गया।
हस्ताक्षर या अंगूठे के निशान के फर्जी होने का कोई विशेषज्ञ प्रमाण भी प्रस्तुत नहीं किया गया। कई दस्तावेजों की केवल कार्बन कॉपी पेश की गई, जबकि मूल रिकॉर्ड अदालत में नहीं लाए गए।इन्हीं आधारों पर कोर्ट ने कहा कि जालसाजी और धोखाधड़ी के आरोप साबित नहीं होते और सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
