
मुंगेली, कुणाल सिंह ठाकुर। आधुनिक डिजिटल युग में जहाँ परंपराएं तेजी से बदल रही हैं, वहीं छत्तीसगढ़ का लोकपर्व छेरछेरा आज भी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से मजबूती से जुड़ा हुआ है। इस बार छेरछेरा पर्व का एक नया और आकर्षक स्वरूप देखने को मिला, जब युवा वर्ग और ग्रामीण टोलियों ने साउंड सिस्टम और म्यूजिक के साथ गीत-संगीत गाते हुए घर-घर जाकर छेरछेरा मांगा।पारंपरिक ढोल, मंजीरा और ताशा के साथ अब डीजे, स्पीकर और मोबाइल म्यूजिक सिस्टम भी जुड़ गए हैं। लोकगीतों के साथ-साथ छत्तीसगढ़ी सांस्कृतिक गीतों की धुनों पर बच्चे और युवा नाचते-गाते नजर आए। इससे छेरछेरा पर्व में आधुनिकता का रंग घुलता दिखाई दिया, जो लोगों के आकर्षण का केंद्र बना रहा।छेरछेरा मांगने निकली टोलियां जब “छेरछेरा माई, कोठी के धान ला हेरहेरा” जैसे पारंपरिक बोलों को म्यूजिक के साथ प्रस्तुत कर रही थीं, तो रास्ते में खड़े लोग भी उत्साह से जुड़ते नजर आए। कई स्थानों पर लोग अपने घरों से बाहर निकलकर इस अनोखे अंदाज का आनंद लेते दिखे और दान भी बढ़-चढ़कर दिया।स्थानीय नागरिकों का कहना है कि डिजिटल साधनों के उपयोग से परंपरा को नई पीढ़ी से जोड़ने में मदद मिल रही है। युवाओं में लोकसंस्कृति के प्रति रुचि बढ़ रही है और छेरछेरा पर्व एक बार फिर सामाजिक सहभागिता का उत्सव बनता जा रहा है।हालांकि कुछ बुजुर्गों का मानना है कि सादगी ही इस पर्व की पहचान रही है, लेकिन वे यह भी स्वीकार करते हैं कि समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है, बशर्ते पर्व की मूल भावना—दान, सहयोग और समरसता—बनी रहे।कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि आधुनिक डिजिटल युग में भी छेरछेरा पर्व अपनी सांस्कृतिक आत्मा को संजोए हुए है, जहाँ परंपरा और तकनीक का सुंदर संगम देखने को मिल रहा है।
